Section 351 of BNS in Hindi: आपराधिक धमकी
भारतीय न्याय संहिता 2023 एक नया और आधुनिक कानून है जिसने पुराने Indian Penal Code (IPC) की जगह ली है। धारा 351 BNS उन प्रावधानों में से एक है जो आम नागरिकों के लिए बेहद जरूरी है। पहले IPC की धारा 503, 506 और 507 इन मामलों को संभालती थीं, लेकिन अब BNS ने इन्हें एक ही धारा में समेट दिया है। यह बदलाव कानून को ज्यादा सुसंगत और व्यावहारिक बनाता है।
आपराधिक धमकी की परिभाषा बहुत व्यापक है। इसमें सिर्फ मौखिक धमकी ही नहीं, बल्कि लिखित, गुमनाम या इशारों से दी गई धमकी भी शामिल है। अगर कोई आपको डराने के इरादे से, या आपसे कोई गैरकानूनी काम करवाने के लिए धमकाता है — तो वह इस धारा के तहत दोषी माना जाएगा। BNS और IPC में अंतर यह है कि BNS ने इन सभी पहलुओं को एक जगह और ज्यादा स्पष्टता से लिखा है।
Related Post: Section 115 of BNS in Hindi
आपराधिक धमकी Bharatiya Nyaya Sanhita 2023
BNS 2023 की धारा 351(1) के अनुसार, आपराधिक अभित्रास का अर्थ है — जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी दूसरे को उसके शरीर, संपत्ति या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की धमकी देता है। यह धमकी तीन उद्देश्यों में से किसी एक के लिए दी जाती है: पहला, उस व्यक्ति में संत्रास (terror) पैदा करना; दूसरा, उससे कोई ऐसा काम करवाना जिसके लिए वह कानूनी रूप से बाध्य नहीं; और तीसरा, उसे किसी वैध काम से रोकना। इस धारा में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी है — मृत व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान की धमकी भी इसमें शामिल है, अगर उस मृत व्यक्ति से संबंधित कोई जीवित व्यक्ति हितबद्ध हो।
सारांश: आपराधिक धमकी – धारा 351, भारतीय न्याय संहिता 2023
धारा 351 को चार उपधाराओं में बांटा गया है। प्रत्येक उपधारा एक अलग पहलू को कवर करती है:
उपधारा (1) — परिभाषा: जो कोई किसी को शरीर, संपत्ति या प्रतिष्ठा को क्षति की धमकी देकर डराता है या उससे कोई काम करवाता/रुकवाता है — वह आपराधिक अभित्रास करता है।
उपधारा (2) — सामान्य दंड: सामान्य आपराधिक धमकी देने पर — 2 वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों।
उपधारा (3) — गंभीर धमकी पर दंड: अगर धमकी इनमें से किसी से संबंधित हो:
- मृत्यु या घोर उपहति (Grievous Hurt)
- आग से संपत्ति जलाने की धमकी
- 7 वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराध की धमकी
- किसी महिला पर अस्मिता/असतीत्व का लांछन लगाने की धमकी
तो दंड होगा — 7 वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों।
उपधारा (4) — गुमनाम धमकी: अगर कोई अपनी पहचान छिपाकर या गुमनाम संसूचना (anonymous communication) द्वारा धमकी देता है — तो उपरोक्त दंड के अतिरिक्त 2 वर्ष तक का अतिरिक्त कारावास भी मिल सकता है।
नीचे एक सरल तालिका में यह सब देखें:
| उपधारा | अपराध की प्रकृति | अधिकतम दंड |
| 351(1) | परिभाषा (कोई दंड नहीं) | — |
| 351(2) | सामान्य आपराधिक धमकी | 2 वर्ष + जुर्माना |
| 351(3) | गंभीर धमकी (मृत्यु, आगजनी, महिला लांछन) | 7 वर्ष + जुर्माना |
| 351(4) | गुमनाम या पहचान छिपाकर धमकी | उपरोक्त + 2 वर्ष अतिरिक्त |
धारा 351 BNS का व्यावहारिक उदाहरण:
मान लीजिए “क” अपने पड़ोसी “ख” को कहता है — “अगर तुमने मेरे खिलाफ सिविल केस किया तो मैं तुम्हारा घर जला दूंगा।” यह जबरन कार्य करवाना कानून के तहत अपराध है। “क” यहां आपराधिक धमकी का दोषी है क्योंकि उसने “ख” को डराकर उसका कानूनी अधिकार छीनने की कोशिश की।
यह उदाहरण बताता है कि धमकी देकर काम करवाना — चाहे वह अदालत में जाने से रोकना हो या कोई और वैध अधिकार — पूरी तरह दंडनीय अपराध है।
IPC और BNS में तुलना:
| पहलू | IPC (पुराना) | BNS 2023 (नया) |
| संबंधित धाराएं | 503, 506, 507 | केवल 351 |
| महिला लांछन धमकी | अलग से उल्लेखित नहीं | स्पष्ट रूप से शामिल |
| संरचना | बिखरी हुई | एकीकृत और स्पष्ट |
क्रिमिनल इंटिमिडेशन इन हिंदी को समझना अब पहले से कहीं आसान है क्योंकि BNS ने सब कुछ एक जगह संकलित कर दिया है। यह धारा न केवल व्यक्ति की सुरक्षा करती है बल्कि उसके कानूनी अधिकारों की भी रक्षा करती है। मानहानि की धमकी हो, या आगजनी की — BNS 2023 के नए आपराधिक प्रावधान हर तरह की धमकी को गंभीरता से लेते हैं।
Conclusion
Section 351 of BNS in Hindi भारतीय न्याय प्रणाली का एक अहम हिस्सा है। यह धारा हर उस नागरिक की रक्षा करती है जिसे किसी ने डराने, धमकाने या जबरदस्ती करने की कोशिश की हो। चाहे धमकी मौखिक हो, लिखित हो या गुमनाम — कानून हर रूप में इसे अपराध मानता है। BNS 2023 ने इस प्रावधान को और ज्यादा स्पष्ट और मजबूत बनाया है।
अगर आप या आपका कोई जानकार ऐसी किसी स्थिति में है, तो तुरंत पुलिस शिकायत दर्ज कराएं और किसी अनुभवी वकील से सलाह लें। कानून आपके साथ है — बस उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना जरूरी है।

Arjun Sethi is a legal researcher and columnist specializing in constitutional and comparative law. A graduate of NALSAR University, he has published in leading law journals and advised policy think tanks. His work bridges theory and practice, offering readers precise, well-researched insights grounded in academic rigor and ethical clarity.
